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अप्रैल 16, 2012

अगिला अंक मे छपत (हास्य कविता)

 अगिला अंक मे छपत
(हास्य कविता)
रचना भेटल अहाँ के
मुदा अगिला अंक मे ओ छपत
बेसी फोन फान करब त
फुसयाँहिक आश्वासन टा भेटत।

अहाँ के लिखल कहाँ होइए
तयइो हमरा अहाँ तंग करैत छी
हमरा त लिखैत लिखैत आँखि चोन्हराएल
अहाँक रचना हम स्तरीय कहाँ देखैत छी।

रचना कोना क स्तरीय हेतैय सेहो त
फरिछा के अहाँ किएक नहि कहैत छी
हम रचना पर रचना पठबैत छी
मुदा अहाँ त कोनो प्रत्युतरो ने दैत छी।

हम त कहलहुँ अहाँ के लिखल ने होइए
नवसिखुआ के ने लिखबाक ढ़ग अछि
कोनो पत्रिका में त छैपिए जाएत
इहए टा एकटा भ्रम अछि।

ई भ्रम नहि सच्चाई थिक
नवसिखुओ एक दिन नीक लिखत
नहि छपबाक अछि त नहि छापू
लिखनाहर के कतेक दिन के रोकत।

संपादक छी हम अहाँ की कए लेब
मोन होएत त नहि त नै छापब
बेसी बाजब त कहि दैत छी
अहाँ के कनि दिन और टरकाएब।

रचना नुकाउ आ की हमरा टरकाऊ
आँखि तरेरू अहाँ खूम खिसियाऊ
कारीगर ने अछि डरैए वला
किएक ने अहाँ पंचैती बैसाउ।

हे यौ वरीय रचनाकार महोदय
पहिने अहुँ त नवसिखुए रही
आ कि एक्के आध टा रचना लिखी
समकालीन सर्वश्रेष्ठ बनि गेल रही।

सच गप सुनि अहाँ के तामस उठत
तहि दुआरे किछु ने कहब कविता हम लिखब
आश्वासन भेटिए गेल त आब की
ओ त अगिला अंक मे छपत।


अप्रैल 07, 2012

अकक्ष भेल छी। (एकटा हास्य कथा)


अकक्ष भेल छी।
      (एकटा हास्य कथा)

आई दस वर्षक बाद किछु काज स दरभंगा आएल रही। भींसरे भींसरे टेन स दरभंगा स्टेशन उतरले रही कि ने की फुराएल टहलैत टहलैत विश्वविद्यालय कैंपस आबि गेलहुँ। ओतए आबिते मातर सभटा पुरना संस्मरण कॉलेजक पढ़ाई विद्यार्थी जीवनक सभटा हँसी ठीठोला श्यामा माए मंदिर के चक्कर लगाएब जस के तस मोन परि गेल। ओई दिन सोमवार रहै तहू मे सावन महीनाक सोमवारी भक्त लोकनिक भिड़ भिंसरे स बढ़ि गेल रहै की कॉलेज के विद्यार्थी धीया-पूता जवान बुढ़ पुरान सभ पूजा करै लेल अपसियाँत भेल। विशेष कऽ माधवेश्वरनाथ महादेव मंदिर मे और बेसी भीड़। श्यामा माए मंदिर लग पोखरि अछि ओतए माधवेश्वर महादेवक मंदिर सेहो छैक। ओही ठाम श्यामा माए के दर्शन कए बाबाक पूजा लेल महादेव मंदिर अएलहुँ। बाबा के जल बेलपात चढ़ा पूजा केलाक बाद मंदिर स बाहर निकैल बैग पीठ पर लए बिदा भेल रही। कैमरा गारा मे लटकले रहए बिदा होइते रही की पोखरी घाट लक बाबा भेंट भए गेलाह। ओ बजलाह हौ बच्चा के छियह कारीगर एम्हर आब। बाबाक लग मे जा हुनका प्रणाम केलियैन त ओ बजलाह नीके रहअ। अईं हौ कारीगर इ कहअ दारही कटा लेबह से नहि अहि दुआरे त चिन्हैअ में धोखा भए गेल। गारा मे कैमरा लटकल देखलिय त मोन परल जे कहीं तू दरभंगा आएल हेबह। आब ज तूं दरभंगा आबिए गेल छह त हमर पंचैती कए दैए हौ बच्चा कि कहियअ हम त अकऽक्ष भेल छी।
           बाबाक गप सुनी हमरा हँसी स रहल नही गेल। हँसैत हँसैत हम बजलहुँ अइ यौ बाबा अहाँ किएक अकऽक्ष भेल छी आ कथिक पंचैयती। बाबा तामसे अघोर भेल बजलाह अईं हौ कारीगर हम अकऽक्ष भेल छी आ तू दाँत चिआरै मे लागल छह। हम बजलहु यौ बाबा अहाँ जुनि खिसियाउ एकटा गप कहू त अहू सन औधरदानी महादेव ज अकऽक्ष भेल अछि त हमरा सभहक केहेन हाल हेतै। बाबा अपने त सौंसे दुनियाक पंचैयती करैत छी हम एकटा छोट छीन भक्त अहाँक पंचैती कोना करब। बाबा फेर बजलाह हौ बच्चा अप्पन सप्पत कहैत छियैह सत्ते मे हम बड्ड अकऽक्ष भेल छी। हम बजलहुँ यौ बाबा अकऽक्ष त हम मीडियावला सभ भेल छी ख़बर लिखैत आ संपादित करैत, एक चैनल के नोकरी छोरि दोसर चैनल के नाकरी पकड़ैत, मीर्च मसल्ला वला ख़बर बनबैत सुनबैत, चैनल मालिक के दवाब  रूआब सहैत, बौक जेंका चुपचाप अकऽक्ष भेल छी।
    हमर गप सुनि बाबा बजलाह आब हमरो गप सुनबहक की अपने टा कहबहक। हम बजलहुँ नहि यौ बाबा इहेए बात त पुछै लेए छलहुँ जे अहाँ किएक अकऽक्ष भेल छी। बाबा डमरू डूगडूगबैत बजलाह हइए लेए सुनह सबटा राम कहानी जे हम किएक अकऽक्ष भेल छी। हौ बच्चा पहिने एकटा फोटो खीच दैए ने भने चैनलो पर ब्रेकिंग न्यूज़ चला दिहक जे बाबा अकक्ष भेल छथि। लोको त बुझतै ने जे हम केहेन कष्टमय जिनगी जीबि रहल छी। हम बजलहुँ ठीक छैक बाबा अहाँ बजैत जाउ आ हम रेकड केने जाइत छी आ फोटोओ खीच दैत छी मुदा इ कहू जे आई अहाँक त्रिशूल कतए रहि गेल। बाबा अंगोछा स मुँह पुछैत बजलाह हौ कारीगर की कहियअ हौ हम जिबैत जिनगी  अकक्ष भेल छी। गणेश कार्तिक दुनू टा खूरलुच्ची हरदम लड़ाई करैत रहैए एकटा कहैत छै जे हम त्रिशूल ल के नाचब त दोसर कहैत छै जे हम डमरू बजा के नाचब। अहि कहा कही मे इ दुनू टा मुक्कम-मुक्की घिच्चा-तिरी क हमर डमरू सेहो फोरि दैत अछि। एकरा दुनू टा दुआरे हम अकक्ष छी। हौ बच्चा ततबेक नही कि कहियअ हौ नहा धोहआ के बघम्बर पसारि दैत छियैक मुदा कार्तिक के मयूर ओकरा ओई गाछ पर स ओई गाछ पर ल जा के लेरहा घोरहा दैत अछि। तै पर स गणेशक मूस ओकरा कूतैर फूतैर दैत अछि। तूही कहअ त बिना बघम्बर के कोना हम रहब कियो देखनिहार नै कोइ ने टहल टिकोरा क दैत अछि हम त तहु दुआरे अकक्ष भेल छी।
          तूहीं कहअ ने आबक धीया-पूता के लिखा पढ़ा के कि हेतै। हम बजलहुँ आब की भेल यौ बाबा। हमर गप सुनी ओ बजलाह हौ बच्चा तूं बरि खाने बुझहैत छहक कहलियअ त जे हम अपने घरक लोक स अकक्ष भेल छी। हौ बच्चा तोरा सभटा गप की कहियअ जहिया स गणेश के शिक्षामित्र के नोकरी भेटलै आ कार्तिक के पुल बनबै के सरकारी ठिकेदारी भेटलै दुनू गोटे एक्को बेर घूइरो के ने देखैत अछि जे हम जीबैत छी आ की मूइल। तही दुआरे तूंही कहअ ने एहेन धीया-पूता  कोन काजक जे बूढ़ माए बाप के बुरहारी मे मरै लेल  गाम मे असगर छोड़ि दैत अछि आ अपने नोकरी मे मगन भेल सभटा आचार-विचार बिसरैत  सामाजिक कर्तव्य सँ मुह मोड़ि लैत अछि।
      ई गप कहैत-कहैत बाबाक आखि नोरा गेलैन ओ आंखिक नोर पोछि हिंचकैत बजलाह हौ बच्चा आब बुरहारी मे गौरीए दाए टा एकमात्र सहारा। मुदा आब हुनको अवस्था भेलैन ओकरो की दोष। कहैत छियैए जे भांग पीस दियअ त गौरी दाए बजैत छथि आब हमरा भांग पीसल नहि होएत बेसी छौंक लागल अछि त चलि जाउ विश्वविद्यालय कैंपस, शंकरानंद ओइ ठाम भरि छाक भांगक लस्सी पीबि लेब। ओइ ठाम सीएम सांइस आ मारवाड़ी कॉलेज के विद्यार्थी सभ भांग खाई लेल सेहो अबैत छैक। हौ बच्चा हम त तहू दुआरे अकक्ष भेल छी। आब हम एक्को मीनट दरभंगा मे नहि रहब तूं हमरा नेने चलह अपने संगे दिल्ली। हम तोरे साउथ एक्स वला डेरा पर रहब ज जारो बोखार लागत त ओही ठाम एम्स मेडिकल लग्गे मे छै ओतए देखाइओ दिहअ। हम बजलहुँ हं हं बाबा चलू ने इ त हमर सौभाग्य जे अहाँक टहल टिकोरा करबाक हमरा अबसर भेटत।
बाबा बजलाह हौ बच्चा एकटा गप तोरा कहनाइ त बिसैरे गेलियै रूकह कनि, हइए मोन परि गेल। कारीगर सभटा गप तू की सुनबहअ हौ हम की कहियअ ई भागेसर पंडा दुआरे सेहो हम अकक्ष भेल छी। हम हुनका स पुछलियैन से किएक यौ बाबा। त ओ बजलाह हौ कि कहियअ आब महादेव मंदिर मे बोर्ड लगा देलकैयै। हम जिज्ञासावस पुछलहु कथिक बोर्ड यौ बाबा। ओ फेर बजलाह हौ बच्चा श्यामा माए मंदिर में एकटा बोर्ड लागल छैक मुंडन-51रू, यज्ञोपवित-151रू, विबाह-251रू, आ बलिप्रदान-501रू तही के देखा देखी भागेसरो हमरा मंदिर मे एकटा बोर्ड लगा देलकैए जे बाबाक स्पेशल पूजा-501रू, डमरू बजा के पूजा करब-201, दूध चढ़ाएब-151 आ भांगक स्पेशल परसादी-101रू। देखैत छहक जहिया स ई बोर्ड लगलैह तहिया स त हम और बेसी अकक्ष भेल छी।
         हम बजलहुँ से किएक यौ बाबा त ओ बजलाह कि कहियअ विद्यार्थी सभ भांगक परसादी दुआरे मंदिरे मे मुक्कम मुक्की, घिच्चम-तिरी, देह हाथ तोरा-फोरी कए लैत अछि। ततबेक नहि पिछुलका सोमवारी दिन त कि कहियअ एकरा सबहक झग्गरदन मे हमर त्रिशूल टुटि गेल हम त आब तहु दुआरे अकक्ष भेल छी। ओ सभ नीक नहाति पढ़तह नहि आ परीक्षा मे फेल भेला पर वा कम नम्बर अएला पर हमरो गरिअबैत अछि। जे हे जरलाहा महादेव केहने बेईमान छह पास करा दैतह से नहि हौ बच्चा हम त आब तहू दुआरे अकक्ष भेल छी।

लेखक:- किशन कारीगर

मार्च 19, 2012

दहेज


दहेज

दहेजक नाम सुनि कऽ
कांइपि उठैत अछि ,माए-बापऽक करेज
कतबो छटपटायब तऽ
लड़कवला कम नहि करताह अपन दहेज।
ओ कहताह, जे बियाह करबाक अछि
तऽ हमरा देबैह परत दहेज
पाई नहि अछि तऽ
बेच लिय अपना जमीनऽक दस्तावेज।
दहेज बिना कोना कऽ करब
हम अपना बेटाक मैरेज
दहेज नहि लेला सऽंॅ खराब होयत
समाज में हमर इमेज।
एहि मॉडर्न जुग मे तऽ
एहेन होइत अछि मैरेज
आयल बरियाति घूरीकऽ जाइत छथि
जऽंॅ कनियो कम होइत अछि दहेज।
मादा-भूर्ण आओर नव कनियाक
जान लऽ लैत अछि इ दहेज
ई सभ देखि सूनि कऽ
काइपि उठैत अछि किशन के करेज।
समाज के बरबाद केने
जा रहल अछि ई दहेज
बचेबाक अछि समाज के तऽ
हटा दियौ ई मुद्रारूपी दहेज।
खाउ एखने सपत ,करू प्रतिज्ञा
जे आब नहि मॅंागब दहेज
बिन दहेजक हेतै आब सभ ठाम
सभहक बेटीक मैरेज।

लेखक:- किशन कारीगर
       संवाददाता, आकाशवाणी दिल्ली ।

मार्च 07, 2012

कक्का हमर उचक्का (होली पर हास्य कविता)




 कक्का हमर उचक्का ।

                     होली पर हास्य कविता

 

 

ओंघराइत पोंघराइत हरबड़ाइत धड़फराइत धांई दिस

बान्हे पर खसलाह कक्का हमर उचक्का

होरी मे बरजोरी देखी मुस्की मारैत

काकी मारलखिन दू-चारि मुक्का।।

 

धिया-पूता हरियर पीयर रंग सॅं भिजौलकनि

बड़की काकी हॅसी क घिची देलखिन धोतीक ढे़का

पिचकारी मे रंग भरने दौगलाह हमर कक्का

अछैर पिछैर के बान्हे पर खसलाह कक्का हमर उचक्का।।

 

होरी खेलबाक नएका ई बसंती उमंग

ततेक गोटे रंग लगौलकनि मुॅंह भेलैन बदरंग

काकी के देखैत मातर कक्का बजलाह

आई होरी खेलाएब हम अहींक संग।।

 

कक्का के देखैत मातर काकी निछोहे परेलीह आ बजलीह

होरी ने खेलाएब हम कोनो अनठीयाक संग

जल्दी बाजू के छी अहॉं नहि त मुॅंह छछारि देब

घोरने छी आई हम करिक्का रंग।।

 

भाउजी हम छी अहॉक दुलरूआ दिअर 

होरी खेला भेल छी हम लाल पिअर

आई त भैयओ नहि किछू बजताह जल्दी होरी खेलाउ

एहेन मजा फेर भेटत नेक्सट ईअर।।

 

सुहर्दे मुॅंहे मानि जाउ यै भाउजी

नहि त करब हम कनि बरजोरी

होरी मे त अहॉ जबान बुझाइत छी

लगैत छी सोलह सालक छाउंड़ी।।

 

आस्ते बाजू अहॉक भैया सुनि लेताह 

कहता किशन भए गेल केहेन उच्का

केम्हरो सॅ हरबड़ाएल धड़फराएल औताह

छिनी क फेक देताह हमर पिनी हुक्का।।

 

आई ने मानब हम यै भाउजी

फुॅसियाहिक नहि करू एक्को टा बहन्ना

आई दिउर के भाउजी लगैत अछि कुमारि छांउड़ी

रंग अबीर लगा भिजा देब हम अहॉक नएका चोली।।

 

ठीक छै रंग लगाउ होरी मे करू बरजोरी

आई बुरहबो लगैत छथि दुलरूआ दिअर

ई सुनि पुतहू के भाउजी बुझि होरी खेलाई लेल

बान्हे पर दौगल अएलाह कक्का हमर उचक्का।।

लेखक :- किशन कारीगर 


 

मार्च 06, 2012

निबंध प्रतियोगिता

दिल्ली सँ प्रकाशित मासिक मैथिलि पत्रिका मिथिलांचल पत्रिका के द्वारा कक्षा ८  सँ ल के बी.ए/बी.एस.सी/ बी.कॉम/इंजीनियरिंग /चिकित्सा विज्ञानं के छात्र हेतु एकटा निबंध प्रतियोगिता रखल गेल अछि .
निबंध के विषय :- "मातृभाषाक माध्यम सँ विज्ञानं एवं प्रोद्योगिकी के शिक्षा कतेक सार्थक अछि "
 जाही में प्रतिभागी हेतु नियम :-
१. कक्षा ९ सँ - स्नातक तक के छात्र भाग लय सकैत छथि
२. उम्र सीमा - १२ वर्ष -२२ वर्ष
३.रचना मौलिक हेबाक चाही एवं स्व लिखित हेबाक चाही
४.आलेख मैथिलि भाषा में हेबाक चाही
५.रचना पठेबक अंतिम तिथि - २५ मार्च २०१२
६. प्रतिभागी लोकनि अप्पन आलेख mithilanchalpatrika@gmail.com   या   B-2/333 Tara Nagar, Old Palam Road Sec-15 Dwarka New Delhi-110078. पर पठाबी
७. आलेखक संग अप्पन परिचय एवं पत्राचारक पता अबश्य पठाबी
८. विशेष जानकारी हेतु संपर्क करी Mob -9990065181 /9312460150/ 09762126759.

निर्णयाक मण्डली में छैथि :- १.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र २.डॉ. प्रेम मोहन मिश्र ३. श्री गजेन्द्र ठाकुर ४. डॉ. शशिधर कुमार
पुरस्कार :- निबंध प्रतियोगिता में चयनित प्रतिभागी के समुचित पुरस्कार राशी एवं प्रमाणपत्र  पठौल जाएत

भबदीय
डॉ. किशन कारीगर
(संपादक ) मिथिलांचल पत्रिका

मार्च 05, 2012

करीक्का रूपैया - (हास्य कविता)

करीक्का रूपैया।
(हास्य कविता)
नेहोरा करैत करैत मरि गेल कारीगर
नहि लियअ आ ने दियअ करीक्का रूपैया
मुदा ई की कोनो काज करेबाक अछि 
त कहल जायत जल्दी लाउ करीक्का रूपैया।

मौका भेटला पर सरकारी बाबू नहि छोड़त
रूपैया बिन एक्को टा काज ने होएत
अहाँ फायल ल व्यर्थ घूमैत छी यौ भैया
काज करेबाक अछि त जल्दी लाउ करीक्का रूपैया।।

कहलहुँ त स्वीस बैंक मे खाता खोलाएब
चुपेचाप पार्टी ऑफिस मे चंदा जमा कराएब
जीबैत जिनगी हम अप्पन मुर्ती बनाएब
मोन होएत त विदेश यात्रा पर जाएब।।

कतबो हल्ला करब तै स की
स्वीस बैंक मे जमा रहत करबै की
लुटा रहल अछि सरकारी खजाना
अहुँ लुटु हमहुँ लुटैत छी जमा करू करीक्का रूपैया।।

भ्रष्टाचाराक ढे़रीऔलहा संपति हमरे छी
एहि दुआरे पक्ष-विपक्ष मे झगरा भेल औ भैया
एक दोसराक मुँह पर करीक्का स्याही फेकलक
राजनैतिक घमासान मचा देलक करीक्का रूपैया।।

रामलीला मैदान मे जनआंदोलन भेल
लोकपाल पर कोनो ठोस कारवाई ने भेल
सरकार फोंफ काटि रहल अछि बुझलहुँ की
साफ सुथरा लोकपाल कहियो आउत ने।।

भ्रष्टाचार मे खूम नाम कमेलहुँ मुदा
तइयो संतोष नहि भेल औ भैया
भ्रष्टाचाराक रोटी खा देह फुलाउ
संपैत ढ़ेरियाउ अहाँ जमा करू करीक्का रूपैया।।

दुनियाक सभ सँ नमहर लोकतंत्र मे
कुर्सी हथिएबाक होड़ मचल अछि
अहाँ जुनि पछुआउ गठजोड़ करू यौ भैया
चुपेचाप अहाँ जमा करू करीक्का रूपैया।।

हल्ला-गुल्ला करने किछ काज ने होएत
बिना किछ लेने-देने फायल ने घुसकत
ईमानदारी स किछो नहि तकैत की छी
जल्दी जेबी गरम करू लाउ अहाँ करीक्का रूपैया।।

लेखक:- किशन कारीगर

फ़रवरी 01, 2012

चाह पीबू (हास्य कविता)

चाह पीबू।
        (हास्य कविता)
 
हरबड़ी मे जुनि ठोर पकाउ यौ नेता जी
दिल्लीक कुर्सी भेटल सूखचेन स अहाँ बैसू
आउ हम बेना डोला दैत छी
फूकी फूकी अहाँ गरम-गरम चाह पीबू।।
 
भूखे मरि रहल अछि जनता मरअ दियौअ ओकरा
नहि कोनो चिन्ता अहाँ के कोन अछि बेगरता
संसद के कुर्सी पर बैसल अराम अहाँ करू
करिक्का रूपैया स बैंक बैलेंस अहाँ भरू।।
 
मूर्ती बनबै स रथ यात्रा करै लेल पाई अछि
मुदा रोटी रोजगार हेतू एक्को टा पाई नहि अछि
फुसयाँहीक चुनावी घोषणा पर घोषणा टा करू
कुर्सी भेटल त घोटाला पर महाघोटाला टा करू।।
 
बाजि गेल चुनावी पीपही
राजनैतिक गठजोड़ जल्दी अहाँ करू
जुनि पछुआउ सियासी कुर्सी अहाँ ताकू
फेर पाँच साल जनता के बेकूफ बनाएल करू।।
 
दुनियाक सभ स नमहर लोकतंत्र
बनि गेल वोट बैंकक भेड़तंत्र
सम्प्रदायिकता के आगि मे जनता के झरकाउ
कुर्सी हथियाबै लेल रचू कोनो नबका षड्यंत्र।।
 
पहिने कुर्सी फेर मंत्रालय कोना भेटत
सभटा छल प्रपंच अखने अहाँ करू
हे यौ लोकप्रिय भलमानुष जनप्रतिनिधी
संसदो मे अहाँ खूम मुक्कम मुक्की करू।।
 
कुर्सीक खातिर देशक संसाधन बेचलहुँ
बाँचल खूचल सेहो एक दिन अहाँ बेचू
जनता भूखे मरि गेल ओ बिलैटि गेल
मुदा साले साल राजनैतिक रोटी अहाँ सेकू।।
 
मँहगाइ भूखमरी कोनो समाधान ने कराउ
कृषि मंत्रालय मे राखल अन्न अहाँ सड़ाउ
संसद के कैंटीन में सरकारी सब्सिडी लगाउ
चिकन कोरमा शाही पनीर भरिपेट अहाँ खाउ।।
 
घोटाला पर महाघोटाल सभ केलहुँ
तइयो ने पेट अहाँ के भरल
मिठ बोली बाजि जनता के ठकलहुँ
एक्को दिन भूखले पेट होएत अहाँ के रहल
 
कतेको लोक भूखले मरि गेल बेकार भेल अछि किएक
संसद भवन स एक दिन बाहर निकलि अहाँ त देखू
की भा परैत छैक एक्के दिन मे बुझिए जेबैए
बिना किछ खेन्ने एक दिन भूखले रहि के अहाँ देखू।।
 
मुदा कोनो चिन्ता नहि आब कुर्सी भेटिए गेल
संसद भवन मे सूखचेन स अहाँ बैसू
कारीगर बेना डोला दैत अछि
फूकी फूकी  अहाँ गरम-गरम चाह पीबू।।