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जून 12, 2011

सेहनता - किशन कारीगर

सेहन्ता ।

हमरो छल एकटा सेहन्ता औ बाबू
कहियो त उठी कहब अहाँ
आब उठू यौ बौआ भेलैए भोर
अहाँक दोस महीम कए रहल छथि सोड़।।

हिचुकै हिंचुकै एसगर हम कनैत छलहु
देखितहुँ अहाँ से छुटि नहि भेल
हालो चाल त पुछितहुँ हमर
मुदा कहियो अहाँ के सेहन्तो नहि भेल।।

हमर सेहन्ता एकटा सपने रहि गेल
कहियो अहाँक हृदय मे हमर स्नेह नहि भेल
कहियो ने दुलार कए उठेलहु हमरा औ बाबू
विधतो केलैन किस्मतक केहेन खेल।।

सोझहे पाईए टा दए देला सँ
बापक फर्ज़ नहि पूरा भए जायत छैक
हमरो बाप केखनो दुलार करितैथ हमरा
अहिं कहू केकरा ने सेहन्ता होइत छैक।।

एहेन विरान जिनगी सँ नीक
हमरा जनमैते किएक नहि मारि देलहु
अपने मगन मे रहलहुँ सब दिन
कुहसैत एसगर हमरा किएक छोड़ि देलहुँ।।

माएक आँचर बापक साया दूनू गोटे
कोनो छोट नेनाक होइत अछि छाया
मुदा केहेन निष्ठुर भेलहु अहाँ
आई धधकि रहल अछि हमर काया।।

हमर किलकारीक गूँज सुनि
कहियो दौगल अबितहुँ अहाँ
कोरा मे लए हमरा दुलार करितहुँ
मुदा कहियो ऐहेन सेहन्ता भेल कहाँ।।

नेनापन के हमर सबटा सेहन्ता
एकटा सपने रहि गेल
मुदा आबो बिचार कए देखू
कहियो अहाँक मुहो मलीन नहि भेल।।

किएक से अहि कहू
हम कोन अपराध केने रही
हमर सबटा सख मनोरथ के बिसैर
अहाँ अपने मगन मे रही।।

हमरा सँ नीक कोनो अनाथ सँ पूछु
केहेन बेबस होइत छैक ओकर जिनगी
अहाँक जिबैतो हम छी अनाथ
एहने बेबस भए गेल हमर जिनगी।।

केहेन वीरान जिनगी भए गेल
आब नहि अछि कोनो सेहन्ता
सबहक बाप सभ केँ  दुलार पुचकार करैथ
आब एतबाक अछि कारीगर के सेहन्ता।।

लेखक:- किशन कारीगर।




जून 01, 2011

गरीब - किशन कारीगर


ग़रीब ।

हम छी गरीब
नहि आब दैत छथि
हमरा कियो अपना करीब
किएक त हम छी गरीब।।

भरि दिन भूखले रहि केँ
किछु काज राज करैत छी
मुदा तइयो दू टा रोटी
लिखल नहिं अछि हमरा नसीब।।

जेकरे मौका भेटैत छन्हि
वैह हमर शोषण करैत अछि
किछु बाजब त बोइनो नहि भेटत
डरे हम किछु नहि बजैत छी।।

डेग डेग पर भ्रष्टाचार
एसगर हम केकरा सँ लड़ब
धिया पूता अन्न बिनू बिलैख रहल अछि
कहू कोना के हम जिअब।।

ठिकेदारो हमरे कमाई लूटि रहल अछि
जेबी मे नहि अछि एक्को टा टाका
नून रोटी खा कहूना के रहि जइतहुँ
मुदा बढ़ल मँहगाई गरीबक घर देलक डाका।।

टाकाक अभाव मे आब हम
बनि गेलहुँ अस्पतालक मरीज
डॉक्टरो हमरा देखी कहैत छथि
तू दूरे रह नहि आ हमरा करीब।।

विधाता केहेन रचना केलैन
जे हमरा बनौलन्हि गरीब
नहि आब दैति छथि
हमरा कियो अपना करीब।।

आब अहिं कहू यौ समाजक लोक
अधपेटे कोनो जीबैत छी हम
गरीबिक दुशचक्र अछि घेरेने
जिनगी जीबाक आस भेल आब कम।।

जी तोड़ मेहनत करैए चाहैत छी
मुदा कतए भेटत सब दिन काज
काज भेटलो पर होइत अछि शोषण
एना मे कोना करब धीया पूताक पालन पोषण।।

साँझ भिंसर दू टा रोटी भेटैए
एतबाक आस लगेने अछि गरीब
निक निकौत सेहन्तो नहि सोचैत छी
किएक त हम छी गरीब।।

लेखक:- किशन कारीगर।

मई 02, 2011

गजल

ग़ज़ल

हमरा दिल के तोड़ि देलहुँ
हमरा सँ मुह मोड़ि लेलहुँ
छोड़ि क एसगर हमरा अहाँ
हमरा सँ दूर कतहु चलि गेलहुँ ।।

मोनक बात मोने मे रखलहुँ
कहियो अहाँ स नहि कहलहुँ
दूइए दिनक भेंट घांट मे
प्रेम अहाँ स कए लेलहु।।

बाट अहाक तकैत रहलहुँ
मुदा अहाँ नहि अएलहुँ
दूर जाकए हमरा स अहाँ
हमरा मोन के तड़पबैत रहलहुँ।।

याद सताबैए अहाँक त
मोन पड़ैए ओ सभ दिन
जहिया रहैत छलहुँ अहाँ
हमरा स बड्ड खिन्न।।

सपना मे अहिं के देखैत रहलहुँ
अहिंक वियोग मे तड़पैत रहलहुँ
मुदा किशन सन प्रेमी केँ अहाँ
अनपढ़ गंवार बुझैत रहलहुँ ।।

जहिए देखलहुँ एक नज़र अहाँ के
तहिए मोन मे बसि गेलहुँ अहाँ
मुदा हमरा पवित्र प्रेम के
अहाँ नहि बुझि सकलहुँ ।।

आब बुझहब मे आबि रहल अछि हमरा
अहाँक प्रेम मे हम की नहि केलहुँ
मुदा तइयो हमरा मधुबनी मे छोड़ि अहाँ
हमरा स दूर कतहु चलि गेलहुँ ।।

दिल सँ हम साँचो प्रेम केने रही
अहू त ई गप हमरा एक बेर कहने रही
मुदा किएक से अहिं कहू
हमरा सँ दूर अहा कतए चलि गेलहुँ ।।

ज अहू साँचो के प्रेम केने होएब
त मोन पड़ैत होएब हम
मोन सँ निकलैत होयत एकटा गप
कारीगर अहाँ संगे ई की केलहुँ हम।।

हृद्य सँ प्रेम केनिहार बुझहत
प्रियतम सँ दूर हेबाक वियोग
कोना क हम सहलहुँ कनेक अहू बुझहू
निश्छल प्रेम केन रही सभ दिन त कहलहुँ ।।

लेखक:- किशन कारीगर।

अप्रैल 14, 2011

किछु त हम करब


किछु त हम करब
अवस्था भेल हमर आब बेसी टूघैर टूघैर हम चलब
अहाँ आगू आगू हम पाछू पाछू मुदा अपना माटि पानि लेल किछु त हम करब नुनु  बौआ अहाँ  आऊ
बुचि दाय अहूँ आऊ दुनू गोटे मिली जल्दी सँ
मैथिली में किछु खिस्सा सुनाऊ
नान्ही टा में बजलौहं एखनो बाजू मातृभाषा में बाजू अहाँ निधोख कनि अहाँ बाजू कनेक हम बाजब नहि बाजब त कोना बुझहत लोक परदेश जायत मातर किछु लोग बिसैर जायत छित मातृभाषा कें
अहिं बिसैर जायब त आजुक नेना कोना बुझहत
कहें मीठगर स्वाद होयत अछि मातृभाषा कें अप्पन माटि पानि अप्पन भाषा संस्कृति
पूर्वज के दए गेल एकटा अनमोल धरोहर एही धरोहर के हम बंचा के राखब
अपना माटी पानि लेल किछु त हम करब कोना होयत अप्पन माटिक आर्थिक विकास सभ मिली एकटा बैसार करू कनेक सोचू सभहक अछि एकटा इ दायित्व किछु बिचार हम कहब किछु त अहूँ कहू हमरा अहाँक किछु कर्तब्य बनैत अछि एही परम कर्तब्य सँ मुहँ नहि मोडू स्नेह रखू हृदय में सभ के गला लगाऊ
अपना माटी पानि सँ लोक के जोडू समाजक लोक अपने में फुट्बैल करैत छथि
मनसुख देशी त धनसुख परदेशी एक्के समाज में रहि ऐना जुनि करू एकजुट हेबाक प्रयास आओर बेसी करू एक भए एक दोसरक दुःख दर्द बुझहब
अनको लेल किएक ने कतेको दुःख सहब
आई एकटा एहने समाजक निर्माण करब जीबैत जिनगी किछु त हम करब हाम्रो अछि एकटा सेहनता एक ठाम बैसी
सभ लोक अपन भाषा में बाजब औरदा अछि आब कम मुदा जीबैत जिनगी अपना माटी पानि लेल किछु त हम करब
लेखक - किशन कारीगर

अप्रैल 03, 2011

कक्का हमर उचक्का ।

    कक्का हमर उचक्का
                     होली पर हास्य कविता


ओंघराइत पोंघराइत हरबड़ाइत धड़फराइत धांई दिस
बान्हे पर खसलाह कक्का हमर उचक्का
होरी मे बरजोरी देखी मुस्की मारैत
काकी मारलखिन दू-चारि मुक्का।।

धिया-पूता हरियर पीयर रंग सॅं भिजौलकनि
बड़की काकी हॅसी घिची देलखिन धोतीक ढे़का
पिचकारी मे रंग भरने दौगलाह हमर कक्का
अछैर पिछैर के बान्हे पर खसलाह कक्का हमर उचक्का।।

होरी खेलबाक नएका बसंती उमंग
ततेक गोटे रंग लगौलकनि मुॅंह भेलैन बदरंग
काकी के देखैत मातर कक्का बजलाह
आई होरी खेलाएब हम अहींक संग।।

कक्का के देखैत मातर काकी निछोहे परेलीह बजलीह
होरी ने खेलाएब हम कोनो अनठीयाक संग
जल्दी बाजू के छी अहॉं नहि मुॅंह छछारि देब
घोरने छी आई हम करिक्का रंग।।

भाउजी हम छी अहॉक दुलरूआ दिअर
होरी खेला भेल छी हम लाल पिअर
आई भैयओ नहि किछू बजताह जल्दी होरी खेलाउ
एहेन मजा फेर भेटत नेक्सट ईअर।।

सुहर्दे मुॅंहे मानि जाउ यै भाउजी
नहि करब हम कनि बरजोरी
होरी मे अहॉ जबान बुझाइत छी
लगैत छी सोलह सालक छाउंड़ी।।

आस्ते बाजू अहॉक भैया सुनि लेताह
कहता किशन भए गेल केहेन उचक्का
केम्हरो सॅ हरबड़ाएल धड़फराएल औताह
छिनी फेक देताह हमर पिनी हुक्का।।

आई ने मानब हम यै भाउजी
फुॅसियाहिक नहि करू एक्को टा बहन्ना
आई दिउर के भाउजी लगैत अछि कुमारि छांउड़ी
रंग अबीर लगा भिजा देब हम अहॉक नएका चोली।।

ठीक छै रंग लगाउ होरी मे करू बरजोरी
आई बुरहबो लगैत छथि दुलरूआ दिअर
सुनि पुतहू के भाउजी बुझि होरी खेलाई लेल
बान्हे पर दौगल अएलाह कक्का हमर उचक्का।।

लेखक:- किशन कारीगर ।

               
                                   
परिचय:- जन्म- 19830(कलकता में) मूल नाम-कृष्ण कुमार रायकिशन। पिताक नाम- श्री सीतानन्द राय नन्दू माताक नाम-श्रीमती अनुपमा देबी।मूल निवासी- ग्राम-मंगरौना भाया-अंधराठाढ़ी, जिला-मधुबनी (बिहार)। हिंदी में किशन नादान आओर मैथिली में किशन कारीग़र के नाम सॅं लिखैत छी। हिंदी आ मैथिली में लिखल नाटक आकाशवाणी सॅं प्रसारित एवं दर्जनों लघु कथा कविता राजनीतिक लेख प्रकाशित भेल अछि। वर्तमान में आकशवाणी दिल्ली में संवाददाता सह समाचार वाचक पद पर कार्यरत छी। शिक्षाः- एम. फिल(पत्रकारिता) एवं बी. एड कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरूक्षेत्र सॅं।